प्रणाम! भोजपुरी माटी के ई सोंध महक आ हमनी के पुरखौती विरासत के एगो अइसन अनमोल दस्तावेज पेश बा, जे इंटरनेट के घिसल-पिटल जानकारी से अलग, एकदम ताज़ा आ गहरा चिंतन पर आधारित बा।
भोजपुरी संस्कृति: माटी के महक अउर मन के बतकही
भोजपुरी खाली एगो भाषा अउर बोली ना हवे, ई एगो ‘जीवे के सलीका’ ह। ई उ संस्कृति ह जवना में गंगा के गम्भीरता, पूरब के पुरुवा बयार, आ माटी के ओकरा असल रूप में सहेजे के जिद बा। आज जब दुनिया ग्लोबल हो गइल बिया, तब भोजपुरी संस्कृति के कुछ अईसन पहलू बाड़े जे ओकरा के बाकी सभ से अलग आ बेजोड़ बनावेला।
माटी के दर्शन: ‘जड़’ से जुड़ाव
भोजपुरी संस्कृति के सबसे बड़ मजबूती ओकर कृषि प्रधानता ना, बल्कि ओकर ‘माटी प्रेम’ ह। एगो भोजपुरी भाषी दुनिया के कवनो कोना में रहे, ओकर गोड़ आजुओ अपनी गाँव के पगडंडी खोजेला।
- श्रम के उत्सव: हमनी का काम के बोझ ना, उत्सव मानिले। ‘हँसुवा मनाव’ से लेके ‘खरिहान पूजा’ तक, हर काम में गीत बा।
- प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व: हमनी के संस्कृति में नीम के गाछ ‘निमी मईया’ हई, आ पोखरा के पानी देवता। ई आज के ‘इको-फ्रेंडली’ जमाना से सदियों पहिले के सोच ह।
बतकही: संवाद के एगो अलगे कला
भोजपुरी में ‘बतकही’ के मतलब खाली गप-शप ना होला। ई एगो मौखिक साहित्य (Oral Literature) ह।
- चुहल आ व्यंग्य: भोजपुरी बतकही में जवन ‘रस’ बा, उ कवनो डिक्शनरी में ना मिली। ई बिना कवनो के अपमान कइले ओकरा के आईना देखावे के कला ह।
- चौपाल के लोकतंत्र: गाँव के चबूतरा पर जब बतकही जमेला, त उहाँ ऊँच-नीच के भेद मिट जाला। उहाँ ‘का हाल बा?’ के जवाब में खाली खैरियत ना, बलुक पूरा समाज के हाल सुनावल जाला।
