छठ परब, जेकरा के 'लोक आस्था के महापर्व' कहल जाला, ई खाली एगो व्रत ना ह, ई त एगो अहसास ह, एगो परंपरा ह जवन पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमनी के नस-नस में दौड़त बा। जब कार्तिक मास के अंजोरिया आवेला, त पूरा बिहार, यूपी आ अब त पूरा दुनिया 'कांच ही बांस के बहंगिया' के धुन में रमि जाला।


छठ पूजा काहे मनावल जाला?

छठ पूजा मनावे के पीछे कई गो कथा बा, बाकिर एकर असली मतलब बा 'कृतज्ञता' यानी आभार। सुरुज भगवान साक्षात देवता हवन, जेकरा के हमनी के रोज देखत बानी। उनुका बिना सृष्टि के कल्पना असंभव बा।

  • सृष्टि के रचयिता के आराधना: कहल जाला कि जब भगवान राम रावण के वध कइला के बाद अयोध्या लवटले, त ऊ आ माता सीता कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सुरुज भगवान के पूजा कइले रहली। उहे परंपरा आजुओ चलत आ रहल बा।
  • द्रौपदी आ पांडव: महाभारत काल में जब पांडव आपन राज-पाट हार गइल रहले, तब द्रौपदी छठ के कठिन व्रत कइले रहली, जेकरा बाद उनुकर सब दुख दूर भइल आ पांडवन के राज वापस मिलल।
  • वैज्ञानिक कारण: ई समय अइसन होला जब रितु परिवर्तन होला। सुरुज के किरण (Ultraviolet rays) के प्रभाव शरीर पर खास तरीका से पड़ेला। निर्जला व्रत आ जल में खड़ा होके पूजा कइला से शरीर के ऊर्जा संतुलित रहेला।

छठ पूजा कब मनावल जाला?

छठ पूजा साल में दू बेर मनावल जाला, बाकिर कार्तिक वाला छठ के महत्व सबसे बेसी बा।

  • कार्तिक छठ (बड़का छठ): ई दीपावली के छठवें दिन यानी कार्तिक शुक्ल षष्ठी के मनावल जाला।
  • चैती छठ: ई चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी के मनावल जाला।
ई परब पूरा चार दिन तक चलेला:

  • नहाय-खाय: पहिलका दिन, जब तन आ मन के सुध कइल जाला।
  • खरना: दूसरा दिन, जब गुड़ के खीर आ रोटी के प्रसाद ग्रहण कइला के बाद 36 घंटा के निर्जला व्रत शुरू होला।
  • सांझ के अरघ: तीसरा दिन, डूबत सुरुज के गोड़ लागल जाला। ई दुनिया के इकलौता परब ह जहाँ अस्त होत सुरुज के पूजा होला।
  • भोर के अरघ: चौथा दिन, उगते सुरुज के अरघ देके व्रत पूरा कइल जाला।

छठ पूजा कहाँ-कहाँ मनावल जाला?

पहिले ई मानल जात रहे कि छठ खाली बिहार, झारखंड आ पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) के परब ह। बाकिर आजु दृश्य बदल गइल बा।

  • देश के कोना-कोना में: दिल्ली के जमुना घाट होखे चाहे मुंबई के जुहू चौपाटी, गुजरात के साबरमती के तट होखे चाहे बेंगलुरु के झील, हर जगह 'छठ मईया' के जयकारा गूंजेला।
  • विदेश में छठ: अब त सात समुंदर पार अमेरिका, लंदन, ऑस्ट्रेलिया आ मॉरीशस में भी लोग धूमधाम से छठ मनावत बा। ई परब अब वैश्विक (Global) बन गइल बा।

छठ के 'अनकहल' पहलू: जवन रउआ जानल जरूरी बा

छठ पूजा के सबसे खास बात एकर 'लोकतांत्रिक स्वरूप' बा। अउरी पूजा में पंडित के जरूरत पड़ेला, बाकिर छठ में भक्त आ भगवान के बीच में केहू बिचौलिया ना होला।

मिट्टी आ बांस के महत्व

छठ में जवन सूप आ दउरा के प्रयोग होला, उ 'डोम' समुदाय के लोग बनावेला। मिट्टी के चूल्हा 'कुम्हार' बनावेला। यानी समाज के हर तबका के एह पूजा में बराबरी के भागीदारी बा। ई परब ऊंच-नीच, जात-पात के सब दीवार तोड़ देला।

प्रकृति के सुरक्षा

छठ पूजा के प्रसाद में ऊहे चीज चढ़ेला जवन किसान आपन खेत में उपजावेला— जइसे ठेकुआ (गेहूं), केला, सिंघाड़ा, सुथनी, अदरक, आ गागल नींबू। ई पूजा हमनी के प्रकृति से जोड़ेला। घाट के सफाई कइल आ जल के सम्मान कइल सिखावेला।

छठ के गीत: लोक संस्कृति के रीढ़

छठ पूजा अधूरा बा 'शारदा सिन्हा' आ अउरी लोक गायकन के स्वर बिना। 'महिमा बा अगम अपार', 'केरवा जे फरेले घवद से', ई सब गीत ना ह, ई भावना ह जवन हर भोजपुरी भाषी के आंख में लोर ले आ देला।

निचोड़: छठ खाली परब ना, संस्कार ह

छठ पूजा हमनी के सिखावेला कि जेकर अंत होला, ओकर फेर से उदय भी होला। डूबत सुरुज के पूजा कइल ई बतावेला कि दुनिया में जवन गइल बा, ओकर सम्मान कइल जरूरी बा, तबबे उगते सुरुज के स्वागत हो पाई।

ई परब अनुशासन, शुद्धता आ अपार श्रद्धा के प्रतीक ह। जय छठी मईया!
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