भोजपुरी माटी के ई सुगन्ध अउर ओकर 'Swag' कौनों आम बात ना हटे। ई ऊ एहसास ह जेमे पूरब के संस्कार, गंगा-जमुना के पानी, अउर पुरिखन के आर्शीवाद बसल बा। आज हम भोजपुरी संस्कृति के ओई रूप के चर्चा करब, जे इंटरनेट के चकाचौंध से दूर, गाँव के ओसारा अउर खेतन के मेड़ पर आजुओ जिंदा बा।
भोजपुरी स्वैग
ई कौनों दिखावा ना, 'ऐटिटूड' ह
आजकल के दुनिया में 'Swag' मतलब ब्रांडेड कपड़ा अउर महँग गाड़ी होला, बाकिर हमनी के भोजपुरी स्वैग त ओकरा से बहुत आगे बा।
- गम्छा के टशन: एक गो भोजपुरी मर्द के कान्हा पर जहिया रंगीन 'गमछा' आ जाला, त दुनिया के बड़का से बड़का सूट-बूट फेल हो जाला। ई गमछा खाली कपड़ा ना ह, ई हमनी के आन-बान-शान ह। धूप भईल त माथा पर साफा बन गइल, थकनी लागल त जमीन पर बिछौना बन गइल, अउर केहू से लड़े के भईल त कमर के फेंटा बन गइल।
- बोली के मिठास अउर कड़वाहट: हमनी के बोली अइसन बा कि जेकरा से प्रेम से बोल दीं त ऊ निहाल हो जाई, अउर जहिया 'रउआ' से हट के 'रे' पर आ गईनी, त समझीं कि अगला के खैर नईखे। ई बेबाकी ही भोजपुरी के असली स्वैग ह।
माटी के महक: सोंधी खुशबू के दास्तान
जब अखाढ़ के पहिली बारिश के बूंद 'करैल' (काली मिट्टी) पर गिरेले, त जवन गमक निकले ला, ऊ दुनिया के सबसे महँग परफ्यूम में ना मिली।
- खेत-खलिहान: भोजपुरी संस्कृति के जड़ खेत में बा। जब किसान खेत में हर जोतत घरी 'पिलुआ' गावे ला, त लागेला कि माटी खुद गा रहल बिया।
- लिप्टल रिश्ता: हमनी के इहाँ नाता-रिश्ता खाली खून से ना, माटी से भी होला। गाँव के 'काका' अउर 'चाची' से जवन लगाव होला, ऊ शहर के बंद कमरा में ना मिल पाई।
भोजपुरी खान-पान: स्वाद जवन रूह के तृप्त कर दे
भोजपुरी खाना दुनिया के सबसे संतुलित अउर स्वादिष्ट भोजन में से एक बा।
- लिट्टी-चोखा: ई खाली खाना ना ह, ई इमोशन ह। उपला (गोइठा) के आग पर पाकल लिट्टी अउर ओमे शुद्ध घी के डुबकी, साथ में बैंगन-आलू के चोखा। ई हमनी के पहचान ह।
- दाल-पीठा अउर अनरसा: त्यौहार के समय घर-घर में बने वाला ई पकवान बतावे ला कि हमनी के पूर्वज कितना 'क्रिएटिव' रहले।
भोजपुरी समाज के अनसुना पहलू
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बड़हन के सम्मान | झुकल ही बड़प्पन ह | |||
| पंचायती | आपसी सुलह | बिना कोर्ट-कचहरी के न्याय | |||
| सोहर | लइका के जनम | वंश के बढ़ला के उल्लास | |||
| चैता | चैत के महीना | माटी के बिरह और प्रेम |
कला अउर संगीत: अश्लीलता से दूर, असली सुर
आजकल लोग समझेला कि भोजपुरी मतलब खाली शोर-शराबा, बाकिर असली भोजपुरी संगीत त रूहानी होला।
- भिखारी ठाकुर के विरासत: 'बिदेसिया' के जवन दर्द भिखारी ठाकुर लिखले रहले, ऊ आजुओ आँख में लोर ला देवेला। पलायन के पीड़ा ओकरा से नीक केहू ना लिख पावल।
- बिरहा अउर कजरी: सावन के फुहार में जब कजरी गूंजेला, त मन मयूर नचे लागेला। बिरहा के ऊ ऊँच तान, जेकरा में इतिहास अउर वीरता के गाथा होखेला, ऊ असली भोजपुरी कला ह।
परब-त्यौहार: लोक आस्था के महापर्व छठ
जहिया पूरा दुनिया डूबते सूरज के देख के डर जाला, तहिया हमनी के भोजपुरी समाज 'डूबते सूरज' के पूजा करेला। ई 'छठ पूजा' हमनी के सिखावे ला कि अंत ही आरंभ ह।
- शुद्धता अउर सादगी: बिना कौनों पंडित, बिना कौनों मंदिर, सीधे प्रकृति (सूर्य अउर जल) के साथ जुड़ाव। ईहे हमनी के संस्कृति के सबसे बड़का स्वैग ह।
आधुनिकता अउर चुनौती
आज हमनी के भाषा अउर संस्कृति के अश्लीलता के चादर ओढ़ावल जा रहल बा। बाकिर असली 'माटी के लाल' के जिम्मेदारी बा कि ऊ पुरान मर्यादा के बचा के रखे।
- याद राखीं: जवन पेड़ अपना जड़ (संस्कृति) के छोड़ देवेला, ऊ बेसी दिन ले खड़ा ना रह पावेला।
भोजपुरी संस्कृति कौनों क्षेत्र ना, बल्कि एक विचार ह। ई 'बाती' ह जवन अंधकार में भी प्रकाश देवेले। हमनी के स्वैग ओकरा में बा कि हम कतनो पढ़ लिख लीं, कतनो विदेश घूम आई, बाकिर जब गाँव के माटी पर पैर रखीं त मुँह से 'जय राम जी की' अउर 'प्रणाम काका' ही निकले।
