महर्षि वाल्मीकि के बारे में ई एगो अइसन जानकारी बा जेकरा के हम रउआ खातिर एकदम आसान भासा में आ विस्तार से लिखले बानी।
जब-जब दुनिया में धर्म आ अधर्म के बात होला, तब-तब रामायण के नाम सबसे पहिले आवेला। आ जब रामायण के नाम आवेला, त महर्षि वाल्मीकि के नाम खुद-ब-खुद ओकरा से जुड़ जाला। बाकिर का रउआ जानत बानी कि महर्षि वाल्मीकि के रहनी? ऊ कहाँ के रहनी आ कइसे एगो डाकू से 'ब्रह्मऋषि' बन गइनी?
आज हमनी के आपन बोली भोजपुरी में उनकर जीवन के हर ऊ पन्ना खोलब जा, जे इंटरनेट पर अक्सर आधा-अधूरा मिलेला।
के रहनी महर्षि वाल्मीकि?
वाल्मीकि जी के 'आदिकवि' कहल जाला। आदिकवि मतलब दुनिया के सबसे पहिला कवि। उनकर असली नाम रत्नाकर रहे। ऊ महर्षि कश्यप आ अदिति के नाती आ वरुण (अदिति के लइका) के बेटा रहनी। बाकिर किस्मत के खेल देखीं, बचपन में ऊ अपना परिवार से बिछड़ गइनी आ एगो भील समुदाय में उनकर पालन-पोषण भइल।
कहाँ के रहनी?
पुराणन के हिसाब से, महर्षि वाल्मीकि के मुख्य आश्रम उत्तर प्रदेश के बिठूर (कानपुर) में गंगा नदी के तीरे रहे। एकरा के 'ब्रह्मावर्त' भी कहल जाला। कहल जाला कि एही जगह पर सीता माई अपना बनवास के समय रहली आ लव-कुश के जनम भी एही आश्रम में भइल रहे। आज भी बिठूर में वाल्मीकि आश्रम एगो बहुत बड़ तीर्थ स्थल बा।
'रत्नाकर' से 'वाल्मीकि' बने के अनसुना कहानी
रत्नाकर के शुरुआती जीवन बहुत कठिन रहे। ऊ अपना परिवार के पेट भरे खातिर जंगल के रस्ता से गुजरे वाला लोगन के लूटत रहनी। लोगन के डराइल-धमकाइल आ धन छीन लेना ही उनकर पेशा बन गइल रहे।
नारद मुनि से मुलाकात:
एगो समय के बात बा, देवर्षि नारद ओही जंगल से गुजरत रहनी। रत्नाकर उनकरा के रोक लिहलनी। नारद मुनि बिल्कुल ना डेराइनी आ मुस्कुरात भइले, "तू ई पाप काहे करत बाड़ू?"
रत्नाकर कहलनी, "अपना परिवार खातिर।"
नारद मुनि पूछनी, "का तोहार परिवार तोहार एहि पाप में भी भागीदार बनी? जा के पूछ के आ।"
रत्नाकर जब घरे गइनी आ अपना मेहरारू आ लइकारु से पूछनी, त सब केहू मना कर दिहलस। सब केहू कहलस कि 'कमा के खिलाइल रउआ धरम ह, बाकिर रउआ जवन पाप करत बानी ओकर फल रउआ के ही भोगे के पड़ी।'
ई सुन के रत्नाकर के आँखि खुल गइल। ऊ वापस दौड़ के नारद मुनि के गोड़ पकड़ लिहलनी।
तपस्या आ 'वाल्मीकि' नाम के रहस्य
नारद मुनि उनकरा के 'राम' नाम जपे के सलाह दिहनी। बाकिर रत्नाकर के मुख से 'राम' शब्द निकलत ही ना रहे। तब नारद मुनि कहनी कि तू 'मरा-मरा' जप। 'मरा' कहत-कहत अपने आप 'राम-राम' हो जाए लागल।
रत्नाकर एतना गहरा तपस्या में लीन हो गइनी कि बरिसों बीत गइल। उनकर देह पर दीमक (Ant-hills) अपना घर बना लिहलस। संस्कृत में दीमक के घर के 'वाल्मीक' कहल जाला। जब तपस्या पूरा भइल आ ऊ ओहि दीमक के घर से बाहर निकलनी, त ब्रह्मा जी उनकर नाम 'वाल्मीकि' रख दिहनी।
रामायण के रचना: एगो घटना से उपजल कविता
वाल्मीकि जी के मन में रामायण लिखे के विचार एगो दुखद घटना से आइल। एक दिन ऊ तमस नदी के किनारे नहाए गइल रहनी। ओहिजा एगो 'क्रौंच' पक्षी के जोड़ा (सारस नियर) प्रेम में मगन रहे। अचानक एगो शिकारी बाण चला के नर पक्षी के मार दिहलस। मादा पक्षी ओकरा वियोग में तड़पे लागली।
ई देख के वाल्मीकि जी के दुख उमड़ गइल आ उनकर मुँह से अचानक एगो श्लोक निकलल:
"मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः..."
ई दुनिया के सबसे पहिला श्लोक मानल जाला। एकरे बाद ब्रह्मा जी के आज्ञा से वाल्मीकि जी 'रामायण' के रचना कइनी, जवना में 24,000 श्लोक बा।
वाल्मीकि जी का करत रहनी?
- साहित्य: ऊ संस्कृत साहित्य के जनमदाता हईं।
- समाज सुधार: ऊ एगो डाकू के भी ऋषि बने के रस्ता देखइनी, जे ई बतावेला कि इंसान अपना कर्म से महान बनेला, जनम से ना।
- संरक्षक: जब भगवान राम माता सीता के त्याग कइनी, तब वाल्मीकि जी ही उनकरा के आश्रय दिहनी। ऊ लव-कुश के गुरु रहनी आ उनकरा के शास्त्र आ शस्त्र के शिक्षा दिहनी।
भोजपुरी समाज में महर्षि वाल्मीकि के महत्व
भोजपुरिया इलाका (बिहार आ यूपी) में वाल्मीकि जयंती बहुत धूमधाम से मनावल जाला। दलित आ वंचित समाज के लोग उनकरा के अपना आराध्य देव मानेला। उनकर कहानी हमनी के सिखावेले कि "भोर के भुलइला अगर सांझ के घरे आ जाए, त ओकरा के भुलइला ना कहल जाला।"
महर्षि वाल्मीकि मात्र एगो ऋषि ना रहनी, ऊ एगो अइसन क्रांति रहनी जे साबित कइलस कि तपस्या आ ज्ञान से इंसान अपना भूतकाल के मिटा के एगो उज्ज्वल भविष्य लिख सकेला। आज उनकर लिखल रामायण हर घर में पूजल जाला।
मुख्य बात जवन याद रखे के चाहीं:
असली नाम: रत्नाकर
पिता: प्रचेता (वरुण)
ग्रंथ: रामायण (संस्कृत)
स्थान: बिठूर, कानपुर
उपाधि: आदिकवि
